टप टप के बहता जाये आँखों का काजल
और काली गहरी होती जा रही है रात
एक एक कर टूट रहे कोमल चमकते सपने
वहाँ क्षितिज पे बढ़ती जाती तारों की बारात
गिन-गिन करती इंतज़ार, घटती जा रही हैं नींदें
पल छिन दूना चौगना बढ़ता जा रहा ये चाँद
चल-चल के थकती, थमती जाती ये साँसें
न रुक रहा, न थम रहा ये खारे पानी का बाँध
तप-तप उसकी याद में झुलसा जाता है तन
देख के खिलखिलाती ये ठंडी होती चाँदनी
बिंदी, मेहंदी, चूड़ी, मेरे छूटे सब सिंगार
वो देखो सज आयी सुबहा, ओढ़े चूनर बाँधनी
मेरे ही रंग ले सजती, निखरी जाये दिशायें
मैं बेरंग बावरी हुई, पड़ी किनारे घाट
रात भी बीती, दिन भी बीता, बीते सारी उमरिया
ये बैरन मनवा फिर भी, जोहे जाए बाट
धीरे धीरे तज कर सब कुछ, क्या तेरे लिए बचाऊंगी
तू मुझको ढूँढेगा तब तक मैं मिट्टी बन जाऊँगी
अंजुरी भर मेरी राख लेकर, अपने तन पर मल लेना
स्पर्श तेरा पाकर ही, शायद मैं तर पाऊँगी
-विभा
और काली गहरी होती जा रही है रात
एक एक कर टूट रहे कोमल चमकते सपने
वहाँ क्षितिज पे बढ़ती जाती तारों की बारात
गिन-गिन करती इंतज़ार, घटती जा रही हैं नींदें
पल छिन दूना चौगना बढ़ता जा रहा ये चाँद
चल-चल के थकती, थमती जाती ये साँसें
न रुक रहा, न थम रहा ये खारे पानी का बाँध
तप-तप उसकी याद में झुलसा जाता है तन
देख के खिलखिलाती ये ठंडी होती चाँदनी
बिंदी, मेहंदी, चूड़ी, मेरे छूटे सब सिंगार
वो देखो सज आयी सुबहा, ओढ़े चूनर बाँधनी
मेरे ही रंग ले सजती, निखरी जाये दिशायें
मैं बेरंग बावरी हुई, पड़ी किनारे घाट
रात भी बीती, दिन भी बीता, बीते सारी उमरिया
ये बैरन मनवा फिर भी, जोहे जाए बाट
धीरे धीरे तज कर सब कुछ, क्या तेरे लिए बचाऊंगी
तू मुझको ढूँढेगा तब तक मैं मिट्टी बन जाऊँगी
अंजुरी भर मेरी राख लेकर, अपने तन पर मल लेना
स्पर्श तेरा पाकर ही, शायद मैं तर पाऊँगी
-विभा
