Monday, 18 December 2017

ये सवेरा सर्दियों का


अलसायी सर्दियाँ
सवेरे सवेरे कोहरे की धुंध
कहीं दूर चूल्हे से उठता धूआँ
और गरम चाय के कप से उठती हुई भाप
मिलकर रचते हैं,,,,, एक रहस्यलोक

देखा है कभी एकटक इनको

आज की घुमावदार गलियों से निकलकर
बीते दुखों के पथरीले रास्तों से होते हुए
यादों के घने जंगल से गुजरकर
ले जाते हैं हमें,,,, ये उस रहस्यलोक में
जहाँ धुंध के बादलों के सिवाय,,,,,, कुछ भी नहीं

ऐसा लगता है,,,,,
कि ज़िन्दगी बादलों की तरह हो गयी है
हल्की,,,, रुई की तरह मुलायम
किसी नन्हे बच्चे की हथेलियों की तरह
धुंध समेट लेती है हमें अपने आप में
हम,,, हम नही रहते, कुछ और ही बन जाते हैं
मुस्कुराते हैं,,,, कभी खो जाते हैं,,,,
दिल-दिमाग दोनों,,,, कुुुछ हल्के से हो जाते हैं
वापिस आने का मन ही नहीं होता
जब तक कोई ये न बोले-
"अरे कहाँ खो गए, किसे ढूँढ रहे हो ख्यालों में"

हाँ हम ढूँढ ही रहे थे
शायद,,,,, "खुद को"