Friday, 10 March 2017

कुछ रंग नए बनाएं





आज चलो फिर होली खेलें,पर कुछ रंग नए बनाएं
रंग बिरंगे रंगों में, कुछ मिजाज़ का तडका लगायें

इक रंग घोलें शरारत का, मन भर सबको सताएं
भागें- दौडें, उछलें-कूदें, मस्ती में खिलखिलाएं

शोखियों में डूब जाएँ फिर, खुद पे थोडा इतरायें
रूठा-रूठी छोड़ के थोडा, सबके नाज़ उठाएं

थोडा सा रंग मुहब्बत का, भर मुट्ठी में छिपा लायें
चुपके से रंग के खुद को ही, उन यादो में भीग जाएँ

आज चलो फिर होली खेलें............

Monday, 6 March 2017

आखिर तुम एक औरत हो


खोया खोया सा कुछ मन है, और आँखों में नीर है
आँसू में बचपन की इक धुंधली सी तस्वीर है

खुला खुला वो घर का आँगन, खिली खिली वो धूप थी
कभी बरखा की नन्ही बूँदें, अठखेली क्या खूब थी
संभाल के दिल में रक्खे हैं, वो पल इक जागीर है
आँसू में बचपन की इक धुंधली सी तस्वीर है

बाबा-दादी, पापा-मम्मी, चाचा-चाची, दीदी-भैया
सारे रिश्ते नाते मिलकर, ख़ुशी से नाचें ता-ता थैया
अपनों से मिली थी जो, वो हँसी तो बेनज़ीर है
आँसू में बचपन की इक धुंधली सी तस्वीर है

खो गयी सारीअल्हड़ता, जाने कब गुज़र गया बचपन
"आखिर तुम एक औरत हो"... इन शब्दों में सिमट गया जीवन
"ज़िम्मेदारी समझो"........, बस यही मेरी तकदीर है
कोई ना समझा मेरे दिल को ,बस इतनी सी पीर है 

Friday, 3 March 2017

नई प्रार्थना.. !!!

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, मा कश्चिद् दुखभागभवेत "

सभी सुखी हों, कोई भी दुःख का भागी ना हो,
जाने कब से हम सभी ये प्रार्थना गाते आ रहे हैं,
पर क्या कभी सोचा है,,, कि हम सुख और दुःख में कैसा व्यवहार करते हैं

दुःख में भगवान् के आगे माथा टेकते हैं, रोते हैं...
और सुख में उसी भगवान् पर प्रसाद और पैसे फेंक कर चढाते हैं
सोचकर देखिये,,,,
क्या कभी सामान्य दिनों में ऐसा हुआ है कि मंदिर जाने पर हमारी आँखें भर आई हों कि उसने हमे कितना कुछ दिया है, और हमने भगवान् को उसकी नेमतों और रहमतो के लिए दिल से धन्यवाद दिया हो....

ऐसे ही जब हम सुखी होते है तो आपस में लड़ते हैं....
मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारे के लिए,,,,,
और जब दुखी होते हैं तो उस परम शक्ति कि "हर चौखट" पर माथा टेकने को तैयार हो जाते है,
चाहे वो मंदिर हो, चाहे मस्जिद, चाहे गुरुद्वारा....
तब हमारी नज़र में किसी भी धार्मिक स्थल में कोई फर्क नही होता, सबमे भगवान् दिखाई देते हैं

सुख में गरीबो और असहायो को हेय दृष्टि से देखते है, दुत्कार देते हैं...
दुःख में हर तरह का दान करते हैं, कि ना जाने कब किसकी दुआएं काम आ जाएँ....
सुख में दूसरे की मदद भी एहसान जताकर करते हैं, बिना ये सोचे कि उस प्रभु ने हमे किसी कि मदद के लायक बनाया है, खुद पर अहंकार करने लगते हैं ,जबकि दुःख में किसी का भी कोई भी काम करने को तैयार हो जाते हैं,,,

ये सब देखकर मन में विचार आता है कि इंसान सुख में ज्यादा अच्छा है या दुःख में....!!!!
क्या ये संसार दुखी होकर ज्यादा सुखी रह सकता है !!!!
भविष्य में धर्म के नाम पर झगडे बंद हो सकें, परोपकार की भावना बढ़ सके, सबको एक परम शक्ति पर विश्वास हो......
क्या इसके लिए हमें अपनी प्रार्थनाएं अब बदल देनी चाहिए..... :( :'(
"सर्वे भवन्तु दुखिनः"...................

Thursday, 2 March 2017

छोटी सी गुडिया

सावन में झूले पड़ते थे , झूले झूला करती थी
बारिश की रिमझिम में गीतों पर
छम छम झूमा करती थी

पहन कर लम्बी सी साडी , सजाकर छोटी सी बिंदिया
आँखों में काजल भर कर के
खुद पर ही मैं मरती थी

पराये घर जाना है इक दिन, अक्सर ये कहते थे लोग
सुन-सुन कर खुश होती थी
कभी मन ही मन डरती थी

इक छोटी गुडिया शादी करके, क्यूँ इतनी बड़ी हो जाती है
कैसे सह लेती है सब कुछ
सबसे पूछा करती थी

मैं भी तो अब नहीं हूँ छोटी , बहुत बड़ी हो गयी हूँ शायद
आज बैठकर सोचा तो,,,,,,,,
आँखें झर-झर झरती थी......

-विभा