"सर्वे भवन्तु सुखिनः, मा कश्चिद् दुखभागभवेत "
सभी सुखी हों, कोई भी दुःख का भागी ना हो,
जाने कब से हम सभी ये प्रार्थना गाते आ रहे हैं,
पर क्या कभी सोचा है,,, कि हम सुख और दुःख में कैसा व्यवहार करते हैं
दुःख में भगवान् के आगे माथा टेकते हैं, रोते हैं...
और सुख में उसी भगवान् पर प्रसाद और पैसे फेंक कर चढाते हैं
सोचकर देखिये,,,,
क्या कभी सामान्य दिनों में ऐसा हुआ है कि मंदिर जाने पर हमारी आँखें भर आई हों कि उसने हमे कितना कुछ दिया है, और हमने भगवान् को उसकी नेमतों और रहमतो के लिए दिल से धन्यवाद दिया हो....
ऐसे ही जब हम सुखी होते है तो आपस में लड़ते हैं....
मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारे के लिए,,,,,
और जब दुखी होते हैं तो उस परम शक्ति कि "हर चौखट" पर माथा टेकने को तैयार हो जाते है,
चाहे वो मंदिर हो, चाहे मस्जिद, चाहे गुरुद्वारा....
तब हमारी नज़र में किसी भी धार्मिक स्थल में कोई फर्क नही होता, सबमे भगवान् दिखाई देते हैं
सुख में गरीबो और असहायो को हेय दृष्टि से देखते है, दुत्कार देते हैं...
दुःख में हर तरह का दान करते हैं, कि ना जाने कब किसकी दुआएं काम आ जाएँ....
सुख में दूसरे की मदद भी एहसान जताकर करते हैं, बिना ये सोचे कि उस प्रभु ने हमे किसी कि मदद के लायक बनाया है, खुद पर अहंकार करने लगते हैं ,जबकि दुःख में किसी का भी कोई भी काम करने को तैयार हो जाते हैं,,,
ये सब देखकर मन में विचार आता है कि इंसान सुख में ज्यादा अच्छा है या दुःख में....!!!!
क्या ये संसार दुखी होकर ज्यादा सुखी रह सकता है !!!!
भविष्य में धर्म के नाम पर झगडे बंद हो सकें, परोपकार की भावना बढ़ सके, सबको एक परम शक्ति पर विश्वास हो......
क्या इसके लिए हमें अपनी प्रार्थनाएं अब बदल देनी चाहिए..... :( :'(
"सर्वे भवन्तु दुखिनः"...................