Thursday, 2 March 2017

छोटी सी गुडिया

सावन में झूले पड़ते थे , झूले झूला करती थी
बारिश की रिमझिम में गीतों पर
छम छम झूमा करती थी

पहन कर लम्बी सी साडी , सजाकर छोटी सी बिंदिया
आँखों में काजल भर कर के
खुद पर ही मैं मरती थी

पराये घर जाना है इक दिन, अक्सर ये कहते थे लोग
सुन-सुन कर खुश होती थी
कभी मन ही मन डरती थी

इक छोटी गुडिया शादी करके, क्यूँ इतनी बड़ी हो जाती है
कैसे सह लेती है सब कुछ
सबसे पूछा करती थी

मैं भी तो अब नहीं हूँ छोटी , बहुत बड़ी हो गयी हूँ शायद
आज बैठकर सोचा तो,,,,,,,,
आँखें झर-झर झरती थी......

-विभा 

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