Saturday, 27 May 2017

ये चाहती हूँ,,,,,, वो चाहती हूँ............


सुनो,,,
तुम किसी के साथ कितना भी फ़्लर्ट कर लो और किसी भी हद्द तक कर लो,
लेकिन अपनी वाइफ होने का हक़ किसी को मत देना
वो हक़ सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए,,,,
मैं तुम्हारे साथ अपनी ज़िंदगी जीना चाहती हूँ
तुम्हारे साथ छोटी से छोटी खुशियां महसूस करना चाहती हूँ
बरसात में सड़क के किनारे भीगते हुए गोलगप्पे खाना चाहती हूँ तुम्हारे साथ,
सर्दियों में शाम को कॉफ़ी पीते हुए टीवी देखना चाहती हूँ तुम्हारे साथ,
गर्मियों की रातों में आसमान के सितारे गिनना चाहती हूँ यूं ही तुम्हारे साथ टहलते हुए......

तुम काम से घर आओ और मुझे आवाज़ लगाओ- "अरे सुन रही हो, कहाँ गयीं",
और मैं तुम्हारी आँखों पर हाथ रखकर कहूं- ज़रा पहचानो मुझे 😀 😀
और तुम झट से मुझे बाहो में भर कर घुमा डालो,,,,,,
पूरा दिन काम से थक कर रात को तुम्हारी बाहो में सिमट जाना चाहती हूँ,
और हर सुबह जगाना चाहती हूँ तुम्हे, तुम्हारे माथे पर एक प्यारे से बोसे के साथ,

तुम्हारे साथ हर दुःख शेयर करना चाहती हूँ, तुम्हारा भी और मेरा भी,,,
तुम्हारे तपते माथे पर रात भर ठन्डे पानी की पट्टी रखना चाहती हूँ, बुखार बहुत जल्दी हो जाता है तुम्हे, है ना,,,
तुम्हारा मूड खराब होने पर बेवकूफियों वाली बातो से तुम्हे हँसाना चाहती हूँ,
हाँ, तुमसे खूब लड़ना चाहती हूँ, खूब रूठना चाहती हूँ, और ज़रा से प्यार से मान भी जाना चाहती हूँ....

ये चाहती हूँ,,,,,, वो चाहती हूँ............
मालूम है कि कुछ नही मिलेगा,
फिर भी,,..........,
चाहती हूँ,,,,
क्यों,,,,,,,,, कुछ गलत है क्या !!!!!

मन को तसल्ली देती हूँ कि किसी को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की कोशिश में लग जाती है
HaHaHa ,,,,,, कतई फ़िल्मी डायलॉग ना..............
फिल्म जैसी ही होती काश ज़िन्दगी,,,,
3 घंटे और Happy Ending,,

पर ये तो ज़िन्दगी है ना यार,
बहुत लंबी होती है कसम से,,,
और तुमसे दूर होने के बाद तो और लंबी होती जा रही है,
जैसे इसने कसम खा ली हो कि...........
"जा, तुझे दूसरा जनम भी नही लेने दूँगी उसका होने के लिए,
तू यूं ही तड़पती रह ज़िन्दगी भर" 😢 😢

Monday, 15 May 2017

बंधन प्यार का या समझौते का.....


एक डोर में बंधकर भी, अलग-अलग है मन
दिल से फिर भी छूट न पाए, कैसा है बंधन

चाहत थी कि दिल कि बातें, दूजा समझे आँखों से
पर वो बोले, मन की गांठे, खोलो अपनी बातों से
न मैं समझूं, न वो समझे, जुड़े न अपनापन
दिल से फिर भी छूट न पाए, कैसा है बंधन

चाहत थी कि सुख-दुःख में मिले मज़बूत सहारा
छोटी-छोटी बातों से घबराकर, वो ढूंढें हाथ हमारा 
वो भी अकेले, हम भी अकेले, गुज़रता जाए जीवन
दिल से फिर भी छूट न पाए, कैसा है बंधन

एक हकीकत है जिंदगी, अपने दम पर कुछ करना है
पर वो बोले ये जिंदगी, बस प्यारा सा इक सपना है
कैसे समझायें, ज़िम्मेदारी में, कहीं खो गयी है धड़कन
करनी पड़ती है मेहनत, सपनों से चलता नही जीवन 

Wednesday, 3 May 2017

अजनबी रिश्ते


रिश्ते सारे अपने हैं, पर कहीं कुछ है अजनबी
हँसी बहुत है, लेकिन कहीं, नमी सी है छिपी छिपी

दिन भर हँसते गाते बीते, कोई फ़िक़र कोई बात नहीं
पर जाने क्यूँ रात भर, जगती हैं आँखें कभी कभी.....

"खुशियाँ हैं तो गम भी हैं", हर कोई ये कहता है
गम क्यूँ इतने भारी होते, बोझ लगे हैं जिंदगी.....

कुछ यादें आती बरसों की, कुछ कल की तो कुछ परसों की
मिटा देता है बस इक लम्हा, गुज़रा था जो अभी अभी....

अक्सर क्यूँ ये रिश्ते अपने,,,,
बिखर जाते हैं बन के सपने,,,,,
गुज़रते जाते वक़्त की है ये, जाने कैसी दिल्लगी....

रिश्ते सारे अपने हैं...... पर
कहीं कुछ है अजनबी,......

-विभा