रिश्ते सारे अपने हैं, पर कहीं कुछ है अजनबी
हँसी बहुत है, लेकिन कहीं, नमी सी है छिपी छिपी
दिन भर हँसते गाते बीते, कोई फ़िक़र कोई बात नहीं
पर जाने क्यूँ रात भर, जगती हैं आँखें कभी कभी.....
"खुशियाँ हैं तो गम भी हैं", हर कोई ये कहता है
गम क्यूँ इतने भारी होते, बोझ लगे हैं जिंदगी.....
कुछ यादें आती बरसों की, कुछ कल की तो कुछ परसों की
मिटा देता है बस इक लम्हा, गुज़रा था जो अभी अभी....
अक्सर क्यूँ ये रिश्ते अपने,,,,
बिखर जाते हैं बन के सपने,,,,,
गुज़रते जाते वक़्त की है ये, जाने कैसी दिल्लगी....
रिश्ते सारे अपने हैं...... पर
कहीं कुछ है अजनबी,......
-विभा

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