Saturday, 28 October 2017

अन्तहीन सफर

एक और दिन गुज़र गया सफर का
हर रात ज़िन्दगी थक कर कुछ देर ठहरती है
दिमाग को निचोड़ कर
उसका रस आँखों से निकालकर पीती है
टुकड़ा-टुकड़ा नींद खाती है
और ख्वाबों के चीथड़ों पर सो जाती है
हाँ, यही है उसकी खुराक़
ये न मिले तो शायद ज़िन्दगी खत्म ही हो जाये

अगले दिन फिर से सफर पर जो निकलना है
ऐसा सफर जो चाहो कि खत्म हो जाये,
लेकिन नहीं होता,,,,,
अपने बस में ही नहीं है

रास्ते के कंकडों से बचाने वाले अपने ही जूते
अपने पैरों को काटते हैं
उम्मीदों की गठरी भारी होती जाती है
और ज़िम्मेदारी का सूरज अपनी गर्मी बढ़ाता जाता है
मुस्कुराहट के पैर भी थकने लगे हैं
कब तक अपने दम पे उम्र खींचे
दूर-दूर तक कोई प्यार की छाँव नज़र नहीं आती
जहाँ कुछ पल सुस्ता लिया जाए

पहुंचना कहाँ है, ये भी तो नहीं पता
जिस भी पड़ाव तक पहुँचो, वहाँ से दूसरा काम देकर फिर सफर पर भेज दिया जाता है

काश कोई तो ऐसा पड़ाव हो
जहाँ कोई बाहें फैलाये इंतज़ार कर रहा हो
जिसकी गोद में ढेरों नींदें हों
जिसकी आँखों में अपनत्व के झरने हो
ज़िन्दगी जी भर अपनी खुराक़ ले सके
जहाँ से आगे जाने की इच्छा ही न हो
अंतहीन सफर के बाद कहीं तो मिले,,,,, 
अंतहीन सुकून 
मृत्यु


-विभा

Wednesday, 4 October 2017

रीति-रस्म और संजोग


न ही जोड़ियाँ स्वर्ग में बनती, न ये होता कोई संजोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग

जरूरी सी ये रीति होती, पवित्र सारी रस्में कहातीं
सात फेरों का नाम धराकर, सात जनम का बंधन बतातीं
सात जनम तो किसने देखे
होता इसी जनम वियोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग

क्यूँ कहा जाता गाड़ी के दो पहियों सा चलता जीवन
दिन, महीने, साल के साथ, जुड़ता जाता मन से मन
मन का मोल कहाँ कोई समझे
रह जाते बस तन के भोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग

माँगने वाले भिखारी कहाते, ये शान से माँगे भीख
समाज- संस्कार दुहाई देते, कभी न मुँह से निकले चीख
सबके साथ हँसते- बोलते
ढोते रहो उमर का रोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग
-विभा