Wednesday, 4 October 2017

रीति-रस्म और संजोग


न ही जोड़ियाँ स्वर्ग में बनती, न ये होता कोई संजोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग

जरूरी सी ये रीति होती, पवित्र सारी रस्में कहातीं
सात फेरों का नाम धराकर, सात जनम का बंधन बतातीं
सात जनम तो किसने देखे
होता इसी जनम वियोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग

क्यूँ कहा जाता गाड़ी के दो पहियों सा चलता जीवन
दिन, महीने, साल के साथ, जुड़ता जाता मन से मन
मन का मोल कहाँ कोई समझे
रह जाते बस तन के भोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग

माँगने वाले भिखारी कहाते, ये शान से माँगे भीख
समाज- संस्कार दुहाई देते, कभी न मुँह से निकले चीख
सबके साथ हँसते- बोलते
ढोते रहो उमर का रोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग
-विभा

2 comments:

Anonymous said...

Very true

विभा said...

धन्यवाद :)