Wednesday, 7 February 2018

एक ख्वाब अधूरा,,,,,अच्छा है


एक ख्वाब अधूरा,,,,, आँखों में
एक चाहत अधूरी,,,,,इस दिल में
सब कुछ ही रहे अधूरा सा
पूरा हो न कभी तो अच्छा है

हज़ार मिन्नतों से चाहा तुझे
कितनी मुद्दतों तक माँगा तुझे
आदत हुई माँगने की इस कदर
अब न ही मिले तू, तो अच्छा है

तेरी हँसी पे मरना चाहती थी
तेरी परवाह करना चाहती थी
तेरी आँखों के इक इक आँसू को
अपनी पलकों पे धरना चाहती थी
खुद का ही होश न रहता अब
तेरा घर न सँवारू, तो अच्छा है

छूने की चाहत होती थी
मिलने की तमन्ना होती थी
तेरी काँधे पे रख के अपना सर
सोने की तमन्ना होती थी
मन में बस गया तू इस क़दर
तन न ही मिले, तो अच्छा है

बिन रस्में-कसमें, बिन फेरे
हरदम रहता है साथ मेरे
कैसे कहूँ के अलग हैं हम
रूह एक हुई, दो हैं चेहरे
जुदा तो अब होने से रहे
पर न हो मिलन भी, तो अच्छा है

कुछ कमियाँ होंगी तेरी भी
कुछ जिद्दें होंगी मेरी भी
गिले शिकवे भी हों जाएँगे
और होंगी पीर घनेरी भी
हक़ीक़त यकीनन कड़वी होगी
तू मीठी याद बन रहे अब, तो अच्छा है

-विभा

Monday, 18 December 2017

ये सवेरा सर्दियों का


अलसायी सर्दियाँ
सवेरे सवेरे कोहरे की धुंध
कहीं दूर चूल्हे से उठता धूआँ
और गरम चाय के कप से उठती हुई भाप
मिलकर रचते हैं,,,,, एक रहस्यलोक

देखा है कभी एकटक इनको

आज की घुमावदार गलियों से निकलकर
बीते दुखों के पथरीले रास्तों से होते हुए
यादों के घने जंगल से गुजरकर
ले जाते हैं हमें,,,, ये उस रहस्यलोक में
जहाँ धुंध के बादलों के सिवाय,,,,,, कुछ भी नहीं

ऐसा लगता है,,,,,
कि ज़िन्दगी बादलों की तरह हो गयी है
हल्की,,,, रुई की तरह मुलायम
किसी नन्हे बच्चे की हथेलियों की तरह
धुंध समेट लेती है हमें अपने आप में
हम,,, हम नही रहते, कुछ और ही बन जाते हैं
मुस्कुराते हैं,,,, कभी खो जाते हैं,,,,
दिल-दिमाग दोनों,,,, कुुुछ हल्के से हो जाते हैं
वापिस आने का मन ही नहीं होता
जब तक कोई ये न बोले-
"अरे कहाँ खो गए, किसे ढूँढ रहे हो ख्यालों में"

हाँ हम ढूँढ ही रहे थे
शायद,,,,, "खुद को"

Saturday, 28 October 2017

अन्तहीन सफर

एक और दिन गुज़र गया सफर का
हर रात ज़िन्दगी थक कर कुछ देर ठहरती है
दिमाग को निचोड़ कर
उसका रस आँखों से निकालकर पीती है
टुकड़ा-टुकड़ा नींद खाती है
और ख्वाबों के चीथड़ों पर सो जाती है
हाँ, यही है उसकी खुराक़
ये न मिले तो शायद ज़िन्दगी खत्म ही हो जाये

अगले दिन फिर से सफर पर जो निकलना है
ऐसा सफर जो चाहो कि खत्म हो जाये,
लेकिन नहीं होता,,,,,
अपने बस में ही नहीं है

रास्ते के कंकडों से बचाने वाले अपने ही जूते
अपने पैरों को काटते हैं
उम्मीदों की गठरी भारी होती जाती है
और ज़िम्मेदारी का सूरज अपनी गर्मी बढ़ाता जाता है
मुस्कुराहट के पैर भी थकने लगे हैं
कब तक अपने दम पे उम्र खींचे
दूर-दूर तक कोई प्यार की छाँव नज़र नहीं आती
जहाँ कुछ पल सुस्ता लिया जाए

पहुंचना कहाँ है, ये भी तो नहीं पता
जिस भी पड़ाव तक पहुँचो, वहाँ से दूसरा काम देकर फिर सफर पर भेज दिया जाता है

काश कोई तो ऐसा पड़ाव हो
जहाँ कोई बाहें फैलाये इंतज़ार कर रहा हो
जिसकी गोद में ढेरों नींदें हों
जिसकी आँखों में अपनत्व के झरने हो
ज़िन्दगी जी भर अपनी खुराक़ ले सके
जहाँ से आगे जाने की इच्छा ही न हो
अंतहीन सफर के बाद कहीं तो मिले,,,,, 
अंतहीन सुकून 
मृत्यु


-विभा

Wednesday, 4 October 2017

रीति-रस्म और संजोग


न ही जोड़ियाँ स्वर्ग में बनती, न ये होता कोई संजोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग

जरूरी सी ये रीति होती, पवित्र सारी रस्में कहातीं
सात फेरों का नाम धराकर, सात जनम का बंधन बतातीं
सात जनम तो किसने देखे
होता इसी जनम वियोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग

क्यूँ कहा जाता गाड़ी के दो पहियों सा चलता जीवन
दिन, महीने, साल के साथ, जुड़ता जाता मन से मन
मन का मोल कहाँ कोई समझे
रह जाते बस तन के भोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग

माँगने वाले भिखारी कहाते, ये शान से माँगे भीख
समाज- संस्कार दुहाई देते, कभी न मुँह से निकले चीख
सबके साथ हँसते- बोलते
ढोते रहो उमर का रोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग
-विभा

Saturday, 16 September 2017

मैं बेरंग बावरी

टप टप के बहता जाये आँखों का काजल
और काली गहरी होती जा रही है रात
एक एक कर टूट रहे कोमल चमकते सपने
वहाँ क्षितिज पे बढ़ती जाती तारों की बारात

गिन-गिन करती इंतज़ार, घटती जा रही हैं नींदें
पल छिन दूना चौगना बढ़ता जा रहा ये चाँद
चल-चल के थकती, थमती जाती ये साँसें
न रुक रहा, न थम रहा ये खारे पानी का बाँध

तप-तप उसकी याद में झुलसा जाता है तन
देख के खिलखिलाती ये ठंडी होती चाँदनी
बिंदी, मेहंदी, चूड़ी, मेरे छूटे सब सिंगार
वो देखो सज आयी सुबहा, ओढ़े चूनर बाँधनी

मेरे ही रंग ले सजती, निखरी जाये दिशायें
मैं बेरंग बावरी हुई, पड़ी किनारे घाट
रात भी बीती, दिन भी बीता, बीते सारी उमरिया
ये बैरन मनवा फिर भी, जोहे जाए बाट

धीरे धीरे तज कर सब कुछ, क्या तेरे लिए बचाऊंगी
तू मुझको ढूँढेगा तब तक मैं मिट्टी बन जाऊँगी
अंजुरी भर मेरी राख लेकर, अपने तन पर मल लेना
स्पर्श तेरा पाकर ही, शायद मैं तर पाऊँगी

-विभा

Tuesday, 29 August 2017

हम लड़कियाँ,,,,,


हम लड़कियाँ,,,,

अपने हिस्से की खुशियाँ, दूसरों पे वारना
सीख जातीं हैं बचपन से, खुद का मन मारना
एक छोटी सी ज़िद पर भी, खाती हैं झिड़कियाँ
हम लड़कियाँ,,,,

नीचे नज़र से ज़मीन कुरेदतीं, जब कोई झिड़क के जाए
मन ही मन निहाल हो जातीं, जब कोई प्यार बरसाए
कुछ न बोलतीं, चुपचाप देखतीं, नजरों से कनखियाँ
हम लड़कियाँ,,,,

सखी-सहेलियाँ संगी-साथी, घर आंगन चौबारा
याद किसी ने तो किया होगा, आज हमें दोबारा
सोच कर ही मुस्कुरा देतीं, जब-जब आती हिचकियाँ
हम लड़कियाँ,,,,

देहरी से जो कदम निकाला, सोचा के आकाश हो लें
झट से पीछे खींच लिया, लोग पता नहीं क्या-क्या बोलें
पीस लेती हैं खुद को, इज़्ज़त-आज़ादी के दरम्याँ
हम लड़कियाँ

हम बँधे तो क्या हुआ, आने वाली नहीं बंधेंगी
खिलेंगी वो, महकेंगी वो, खुले आसमान में उड़ाने भरेंगी
आने वाली पीढ़ी के लिए, उजाले की खोलती खिड़कियाँ
हम लड़कियाँ,,,,,
-विभा

Saturday, 29 July 2017

नींद भी इक ख्वाब है.....


करवटें, सलवटें, दर्द बेहिसाब है
मासूम सी सुकून की, नींद भी इक ख्वाब है

नुकीली सी पथरीली सी ये यादों की गलियां
छुइमुई सपनीली सी, नैनों की कलियां
छिलता है इश्क़ मेरा, न कोई हिज़ाब है
मासूम सी, सुकून की, नींद भी इक ख्वाब है

दौड़ती, भागती, मुसाफिर सी धड़कनें
रुके ख्याल ताकते, बुझे-बुझे अनमने
ठहरेंगे कभी पल दो पल, न कोई जबाब है
मासूम सी सुकून की, नींद भी इक खबाब है

उठी-गिरी, मचलती ये लहरों की हिचकियाँ
दबी-दबी, घुटी-घुटी, किनारों सी सिसकियां
बांध तोड़ ये अश्क़ आज, बहने को बेताब हैं
मासूम सी सुकून की, नींद भी इक ख्वाब है
-विभा