एक ख्वाब अधूरा,,,,, आँखों में
एक चाहत अधूरी,,,,,इस दिल में
सब कुछ ही रहे अधूरा सा
पूरा हो न कभी तो अच्छा है
हज़ार मिन्नतों से चाहा तुझे
कितनी मुद्दतों तक माँगा तुझे
आदत हुई माँगने की इस कदर
अब न ही मिले तू, तो अच्छा है
तेरी हँसी पे मरना चाहती थी
तेरी परवाह करना चाहती थी
तेरी आँखों के इक इक आँसू को
अपनी पलकों पे धरना चाहती थी
खुद का ही होश न रहता अब
तेरा घर न सँवारू, तो अच्छा है
छूने की चाहत होती थी
मिलने की तमन्ना होती थी
तेरी काँधे पे रख के अपना सर
सोने की तमन्ना होती थी
मन में बस गया तू इस क़दर
तन न ही मिले, तो अच्छा है
बिन रस्में-कसमें, बिन फेरे
हरदम रहता है साथ मेरे
कैसे कहूँ के अलग हैं हम
रूह एक हुई, दो हैं चेहरे
जुदा तो अब होने से रहे
पर न हो मिलन भी, तो अच्छा है
कुछ कमियाँ होंगी तेरी भी
कुछ जिद्दें होंगी मेरी भी
गिले शिकवे भी हों जाएँगे
और होंगी पीर घनेरी भी
हक़ीक़त यकीनन कड़वी होगी
तू मीठी याद बन रहे अब, तो अच्छा है
-विभा
