Monday, 18 December 2017

ये सवेरा सर्दियों का


अलसायी सर्दियाँ
सवेरे सवेरे कोहरे की धुंध
कहीं दूर चूल्हे से उठता धूआँ
और गरम चाय के कप से उठती हुई भाप
मिलकर रचते हैं,,,,, एक रहस्यलोक

देखा है कभी एकटक इनको

आज की घुमावदार गलियों से निकलकर
बीते दुखों के पथरीले रास्तों से होते हुए
यादों के घने जंगल से गुजरकर
ले जाते हैं हमें,,,, ये उस रहस्यलोक में
जहाँ धुंध के बादलों के सिवाय,,,,,, कुछ भी नहीं

ऐसा लगता है,,,,,
कि ज़िन्दगी बादलों की तरह हो गयी है
हल्की,,,, रुई की तरह मुलायम
किसी नन्हे बच्चे की हथेलियों की तरह
धुंध समेट लेती है हमें अपने आप में
हम,,, हम नही रहते, कुछ और ही बन जाते हैं
मुस्कुराते हैं,,,, कभी खो जाते हैं,,,,
दिल-दिमाग दोनों,,,, कुुुछ हल्के से हो जाते हैं
वापिस आने का मन ही नहीं होता
जब तक कोई ये न बोले-
"अरे कहाँ खो गए, किसे ढूँढ रहे हो ख्यालों में"

हाँ हम ढूँढ ही रहे थे
शायद,,,,, "खुद को"

Saturday, 28 October 2017

अन्तहीन सफर

एक और दिन गुज़र गया सफर का
हर रात ज़िन्दगी थक कर कुछ देर ठहरती है
दिमाग को निचोड़ कर
उसका रस आँखों से निकालकर पीती है
टुकड़ा-टुकड़ा नींद खाती है
और ख्वाबों के चीथड़ों पर सो जाती है
हाँ, यही है उसकी खुराक़
ये न मिले तो शायद ज़िन्दगी खत्म ही हो जाये

अगले दिन फिर से सफर पर जो निकलना है
ऐसा सफर जो चाहो कि खत्म हो जाये,
लेकिन नहीं होता,,,,,
अपने बस में ही नहीं है

रास्ते के कंकडों से बचाने वाले अपने ही जूते
अपने पैरों को काटते हैं
उम्मीदों की गठरी भारी होती जाती है
और ज़िम्मेदारी का सूरज अपनी गर्मी बढ़ाता जाता है
मुस्कुराहट के पैर भी थकने लगे हैं
कब तक अपने दम पे उम्र खींचे
दूर-दूर तक कोई प्यार की छाँव नज़र नहीं आती
जहाँ कुछ पल सुस्ता लिया जाए

पहुंचना कहाँ है, ये भी तो नहीं पता
जिस भी पड़ाव तक पहुँचो, वहाँ से दूसरा काम देकर फिर सफर पर भेज दिया जाता है

काश कोई तो ऐसा पड़ाव हो
जहाँ कोई बाहें फैलाये इंतज़ार कर रहा हो
जिसकी गोद में ढेरों नींदें हों
जिसकी आँखों में अपनत्व के झरने हो
ज़िन्दगी जी भर अपनी खुराक़ ले सके
जहाँ से आगे जाने की इच्छा ही न हो
अंतहीन सफर के बाद कहीं तो मिले,,,,, 
अंतहीन सुकून 
मृत्यु


-विभा

Wednesday, 4 October 2017

रीति-रस्म और संजोग


न ही जोड़ियाँ स्वर्ग में बनती, न ये होता कोई संजोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग

जरूरी सी ये रीति होती, पवित्र सारी रस्में कहातीं
सात फेरों का नाम धराकर, सात जनम का बंधन बतातीं
सात जनम तो किसने देखे
होता इसी जनम वियोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग

क्यूँ कहा जाता गाड़ी के दो पहियों सा चलता जीवन
दिन, महीने, साल के साथ, जुड़ता जाता मन से मन
मन का मोल कहाँ कोई समझे
रह जाते बस तन के भोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग

माँगने वाले भिखारी कहाते, ये शान से माँगे भीख
समाज- संस्कार दुहाई देते, कभी न मुँह से निकले चीख
सबके साथ हँसते- बोलते
ढोते रहो उमर का रोग
सहेज के रखने का वादा कर ले जाते
खिलौना समझ के फेंक देने वाले लोग
-विभा

Saturday, 16 September 2017

मैं बेरंग बावरी

टप टप के बहता जाये आँखों का काजल
और काली गहरी होती जा रही है रात
एक एक कर टूट रहे कोमल चमकते सपने
वहाँ क्षितिज पे बढ़ती जाती तारों की बारात

गिन-गिन करती इंतज़ार, घटती जा रही हैं नींदें
पल छिन दूना चौगना बढ़ता जा रहा ये चाँद
चल-चल के थकती, थमती जाती ये साँसें
न रुक रहा, न थम रहा ये खारे पानी का बाँध

तप-तप उसकी याद में झुलसा जाता है तन
देख के खिलखिलाती ये ठंडी होती चाँदनी
बिंदी, मेहंदी, चूड़ी, मेरे छूटे सब सिंगार
वो देखो सज आयी सुबहा, ओढ़े चूनर बाँधनी

मेरे ही रंग ले सजती, निखरी जाये दिशायें
मैं बेरंग बावरी हुई, पड़ी किनारे घाट
रात भी बीती, दिन भी बीता, बीते सारी उमरिया
ये बैरन मनवा फिर भी, जोहे जाए बाट

धीरे धीरे तज कर सब कुछ, क्या तेरे लिए बचाऊंगी
तू मुझको ढूँढेगा तब तक मैं मिट्टी बन जाऊँगी
अंजुरी भर मेरी राख लेकर, अपने तन पर मल लेना
स्पर्श तेरा पाकर ही, शायद मैं तर पाऊँगी

-विभा

Tuesday, 29 August 2017

हम लड़कियाँ,,,,,


हम लड़कियाँ,,,,

अपने हिस्से की खुशियाँ, दूसरों पे वारना
सीख जातीं हैं बचपन से, खुद का मन मारना
एक छोटी सी ज़िद पर भी, खाती हैं झिड़कियाँ
हम लड़कियाँ,,,,

नीचे नज़र से ज़मीन कुरेदतीं, जब कोई झिड़क के जाए
मन ही मन निहाल हो जातीं, जब कोई प्यार बरसाए
कुछ न बोलतीं, चुपचाप देखतीं, नजरों से कनखियाँ
हम लड़कियाँ,,,,

सखी-सहेलियाँ संगी-साथी, घर आंगन चौबारा
याद किसी ने तो किया होगा, आज हमें दोबारा
सोच कर ही मुस्कुरा देतीं, जब-जब आती हिचकियाँ
हम लड़कियाँ,,,,

देहरी से जो कदम निकाला, सोचा के आकाश हो लें
झट से पीछे खींच लिया, लोग पता नहीं क्या-क्या बोलें
पीस लेती हैं खुद को, इज़्ज़त-आज़ादी के दरम्याँ
हम लड़कियाँ

हम बँधे तो क्या हुआ, आने वाली नहीं बंधेंगी
खिलेंगी वो, महकेंगी वो, खुले आसमान में उड़ाने भरेंगी
आने वाली पीढ़ी के लिए, उजाले की खोलती खिड़कियाँ
हम लड़कियाँ,,,,,
-विभा

Saturday, 29 July 2017

नींद भी इक ख्वाब है.....


करवटें, सलवटें, दर्द बेहिसाब है
मासूम सी सुकून की, नींद भी इक ख्वाब है

नुकीली सी पथरीली सी ये यादों की गलियां
छुइमुई सपनीली सी, नैनों की कलियां
छिलता है इश्क़ मेरा, न कोई हिज़ाब है
मासूम सी, सुकून की, नींद भी इक ख्वाब है

दौड़ती, भागती, मुसाफिर सी धड़कनें
रुके ख्याल ताकते, बुझे-बुझे अनमने
ठहरेंगे कभी पल दो पल, न कोई जबाब है
मासूम सी सुकून की, नींद भी इक खबाब है

उठी-गिरी, मचलती ये लहरों की हिचकियाँ
दबी-दबी, घुटी-घुटी, किनारों सी सिसकियां
बांध तोड़ ये अश्क़ आज, बहने को बेताब हैं
मासूम सी सुकून की, नींद भी इक ख्वाब है
-विभा

Wednesday, 19 July 2017

मेरी तीज



किसी का मन हिलोरे मारता है
क्योंकि किसी के प्यार का सागर है,,उसके जीवन में
किसी के मन में तरंगे उठती हैं
क्योंकि उसकी ज़िंदगी को खुशियों की vibrations छू के जाती हैं
किसी का मन झंकृत होता है
क्योंकि कहीं कोई उसके लिए प्रेम का संगीत छेड़े हुए है
 किसी का मन मयूर सावन में नाच उठता है
क्योंकि कहीं किसी की आँखें बरस रही हैं
 सिर्फ उससे मिलने के लिए....

लेकिन मेरा मन,,,,,,
मेरा मन तो जैसे रेगिस्तान हो रखा है
दूर तक बस रेत ही रेत
न हिलोरें, न तरंगें
न झंकार, न नर्तन
बस एक न बुझने वाली प्यास है

सुनो.....
पहले ऐसा नहीं था
मेरे मन भी था, लबालब भरा हुआ
प्रेम से,,,,,
इठलाता फिरता, कुलांचे भरता
ढूंढता हुआ किसी को,,,,,,,
जिसे तलब हो इस अमृत की
जो आये तो दो बूंद चखने को
और मैं लौट दूँ पूरा का पूरा सागर उस पर
जिसे मेरी चाहत हो, सिर्फ मेरी.....

"हम भटकते हैं, क्यूँ भटकते हैं,
दश्त-ओ-सेहरा में
ऐसा लगता है, मौज प्यासी है,
अपने दरिया में"

बस ढूंढती ही रह गयी मैं तो
और ये दरिया कब सूख गया,
पता ही नहीं चला
अब कोशिश करना चाहूँ तो भी
इन पथराई आंखों में नमी तक नहीं आती
कांटे से उग आए हैं गले में
प्रेम की चंद बूंदों की खोज में भटकती फिरती हूँ
अरे,,,,, वो क्या सामने
शायद प्रेम है
तेजी से भागकर जाती हूँ,
फिर गिर पड़ती हूँ
कोई नहीं है, कुछ नहीं है मेरे लिए
सिर्फ मेरा भ्रम,,,,,
और इस भरम के साथ जीती हुई मैं.....
-विभा 

Saturday, 15 July 2017

यादों की बारिश


ये बरसात का मौसम,,,,,
अचानक कहीं से आ गया है
एक गहरा काला सा बादल
यादों से लबालब भरा हुआ

बारिश की आशंका से भागती हुई मैं
उतार लाती हूँ सुबह से सूखते नींद के कपड़े
अलमारी में रख देती हूँ सपनों के बड़ी-पापड़
लगा देती हूँ सांकल आंखों की रसोई की
कि भीग सकूँ कुछ देर....
अपनी मनपसंद बारिश में

तेज हो रही बूंदें
लगातार बरस रही यादें
भीगने दो आज जी भर के
आखिर कभी कभी तो छाता है ये बादल
क्यूँ न भीगूँ,,,,

जी चाहता है समेट लूँ इसकी एक एक बूंद को
इनमे भरे अल्फाज़ो की ठंडक को
इनके एहसासों की सोंधी खुशबू को
और रच डालूँ एक प्यारी सी कविता

लेकिन शब्द हैं कि हाथों में रुकते ही नहीं

कविता के हाथ खोलती हूँ
एहसासों की बूंदे समेटने की कोशिश करती हूँ
लेकिन फिसल जाते हैं हाथ से शब्द
एक के बाद एक, कोई नही टिकता
थक गई हूं कोशिश करते करते

फिर छोड़ देती हूँ, बह जाने देती हूँ सब
बस आनंद लेती हूँ इन यादों में भीगने का,,,,,

अंदर तक नम कर गयी है ये बारिश
अब इस नम मिट्टी में ही तो उगेंगे
छोटे छोटे कविताओं के फूल
फिर सहेज कर रखूंगी उन्हें
अगली बारिश के इंतज़ार में
ताकि ये लहलहा सकें, मेरी डायरी की बगिया में

जो गर धूप भी निकल आये ज़िम्मेदारियों की
तो भी इनकी हरियाली यूं ही बनी रहे
-विभा


Sunday, 9 July 2017

कविता किसपे लिखूँ .....


कोई कविता लिखूँ
लेकिन किस पर लिखूँ...........

बारिश हो रही है,
हाँ चलो मैं कविता लिखती हूँ,,,,,
बरसते हुए पानी पर,
इस मौसम रूमानी पर
ठंडी मस्त हवाओं पर,
और बूँदों की अदाओं पर
हरियाली नई नवेली पर,
नदियों की अठखेली पर....
खिलखिलाते भीगते मासूमों पर,
ख़ुशी में टकराते जामों पर
हाँ चलो, मैं कविता लिखती हूँ,,,,

लेकिन ये क्या,,,,बारिश तो रुक गयी
निकल आयी है धूप, चमचमाती हुई शीशे जैसी
आंखों में चुभती हुई,,,
अब कविता किसपे लिखूँ .....

दिन भर के थके कंधो पर
या छाँव ढूंढते परिंदों पर
गर्मी में तपते मकानों पर
या पसीना पोंछते इंसानों पर
सडको पे गाडियों की कतारों पर,
या शोर मचाते बाजारों पर
कीचड़ भरी गलियों पर
या अधखिली मरती कलियों पर
सूखे पपडाते होठों पर
या नम होती आंखों पर.............

बाहर के मौसम के साथ बदलता है दिल का मौसम भी....
कभी उदास होता है, तो किसी मौसम में ढूंढ लेता ख़ुशी
"हर पल बदलता मौसम, यही तो भगवान की #कुदरत है
कहीं ढूंढे गम कहीं ढूंढे ख़ुशी, यही इंसान की #फितरत है...."

Sunday, 25 June 2017

हाँ,,,, मैं खुश हूँ


कुछ ख्याल,,,,
इतने उलझ से गये हैं

सुलझाने की कोशिश कर रही हूँ कितनी देर से,,,,
नाकाम कोशिश....

किस बात को सोचने से शुरू किया था
सोचते सोचते कहाँ आ गयी हूँ
सिरा ही नही मिल रहा
सिर इतना भारी हो चला है
झटक देना चाहती हूँ सब कुछ

लेकिन कैसे....

कुछ बातें,,,,
दिमाग को पता है कि होनी ही हैं
लेकिन दिल नही चाहता कि ऐसा कुछ हो
दिमाग भी थक गया है दिल को समझाते समझाते
कोई उम्र भर साथ नही रहता
अकेलापन सत्य है,,,,,

एक एक करके साथ छूटता सा जा रहा है सबका
लेकिन रुको, मैं यही तो चाहती थी न
अकेलापन,,,,
मुझे तो खुश होना चाहिए
हाँ मैं खुश हूँ
जो चाहो वो मिल जाये तो खुशी होती है
हाँ मानती हूँ कि दिल बहुत दुखता है, जब किसी का साथ छूटता है, लेकिन वक़्त के साथ आदत हो जाती है उसके बिना रहने की

आदत हो चली है अब,,,,
मोह छूटता जा रहा है सबसे
सब कुछ धुंधला होता जा रहा है
इस अकेलेपन को, इस सन्नाटे को रूह के अंदर तक समा जाने दो....
इतना कि मैं खुद की चीख तक न सुन पाऊँ
इन ख्यालों की उलझन से निकलकर बस यही सोचूँ,,,,,
हाँ मैं खुश हूँ
बहुत खुश....
-विभा

Tuesday, 6 June 2017

हाँ....unique हूँ मैं....


डबडबाई सी आँखें, जरा कंपकंपाये से हाथ
और चेहरा छुपा के कहती हूँ - "हाँ.... ठीक हूँ मैं"
सभी करते हैं ऐसे,,,,,,,
फिर कौन सी unique हूँ मैं 

सबके साथ खिल-खिल करना,
अकेले चुपचाप उसकी यादों में मरना
जो न कभी किसी को सुनाई दे,,,,,
वो गहरे मन कि चीख हूँ मैं.....
सभी जीते हैं ऐसे,,,,,,,
फिर कौन सी unique हूँ मैं 

चलते-चलते रुक जाऊं, यूं ही बैठे-बैठे सो जाऊं
जहाँ का कोई पता न हो, किसी ऐसी दुनिया में खो जाऊं
देखूं तो कौन याद करेगा, किसके मन की मीत हूँ मैं....
सभी चाहते हैं ऐसे,,,,,,,
फिर कौन सी unique हूँ मैं ...........

हजारों मौतें मरती हूँ, लाखों आँसू पीती हूँ
जीवन से मुझे बैर बहुत है,,,,, फिर भी इसको जीती हूँ
खुद से ही तो जंग है मेरी,,,,
और खुद पर ही इक जीत हूँ मैं....
भले किसी के लिए न हूँ,,,,,, पर खुद के लिए unique हूँ मैं....

-विभा 

Saturday, 27 May 2017

ये चाहती हूँ,,,,,, वो चाहती हूँ............


सुनो,,,
तुम किसी के साथ कितना भी फ़्लर्ट कर लो और किसी भी हद्द तक कर लो,
लेकिन अपनी वाइफ होने का हक़ किसी को मत देना
वो हक़ सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए,,,,
मैं तुम्हारे साथ अपनी ज़िंदगी जीना चाहती हूँ
तुम्हारे साथ छोटी से छोटी खुशियां महसूस करना चाहती हूँ
बरसात में सड़क के किनारे भीगते हुए गोलगप्पे खाना चाहती हूँ तुम्हारे साथ,
सर्दियों में शाम को कॉफ़ी पीते हुए टीवी देखना चाहती हूँ तुम्हारे साथ,
गर्मियों की रातों में आसमान के सितारे गिनना चाहती हूँ यूं ही तुम्हारे साथ टहलते हुए......

तुम काम से घर आओ और मुझे आवाज़ लगाओ- "अरे सुन रही हो, कहाँ गयीं",
और मैं तुम्हारी आँखों पर हाथ रखकर कहूं- ज़रा पहचानो मुझे 😀 😀
और तुम झट से मुझे बाहो में भर कर घुमा डालो,,,,,,
पूरा दिन काम से थक कर रात को तुम्हारी बाहो में सिमट जाना चाहती हूँ,
और हर सुबह जगाना चाहती हूँ तुम्हे, तुम्हारे माथे पर एक प्यारे से बोसे के साथ,

तुम्हारे साथ हर दुःख शेयर करना चाहती हूँ, तुम्हारा भी और मेरा भी,,,
तुम्हारे तपते माथे पर रात भर ठन्डे पानी की पट्टी रखना चाहती हूँ, बुखार बहुत जल्दी हो जाता है तुम्हे, है ना,,,
तुम्हारा मूड खराब होने पर बेवकूफियों वाली बातो से तुम्हे हँसाना चाहती हूँ,
हाँ, तुमसे खूब लड़ना चाहती हूँ, खूब रूठना चाहती हूँ, और ज़रा से प्यार से मान भी जाना चाहती हूँ....

ये चाहती हूँ,,,,,, वो चाहती हूँ............
मालूम है कि कुछ नही मिलेगा,
फिर भी,,..........,
चाहती हूँ,,,,
क्यों,,,,,,,,, कुछ गलत है क्या !!!!!

मन को तसल्ली देती हूँ कि किसी को शिद्दत से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की कोशिश में लग जाती है
HaHaHa ,,,,,, कतई फ़िल्मी डायलॉग ना..............
फिल्म जैसी ही होती काश ज़िन्दगी,,,,
3 घंटे और Happy Ending,,

पर ये तो ज़िन्दगी है ना यार,
बहुत लंबी होती है कसम से,,,
और तुमसे दूर होने के बाद तो और लंबी होती जा रही है,
जैसे इसने कसम खा ली हो कि...........
"जा, तुझे दूसरा जनम भी नही लेने दूँगी उसका होने के लिए,
तू यूं ही तड़पती रह ज़िन्दगी भर" 😢 😢

Monday, 15 May 2017

बंधन प्यार का या समझौते का.....


एक डोर में बंधकर भी, अलग-अलग है मन
दिल से फिर भी छूट न पाए, कैसा है बंधन

चाहत थी कि दिल कि बातें, दूजा समझे आँखों से
पर वो बोले, मन की गांठे, खोलो अपनी बातों से
न मैं समझूं, न वो समझे, जुड़े न अपनापन
दिल से फिर भी छूट न पाए, कैसा है बंधन

चाहत थी कि सुख-दुःख में मिले मज़बूत सहारा
छोटी-छोटी बातों से घबराकर, वो ढूंढें हाथ हमारा 
वो भी अकेले, हम भी अकेले, गुज़रता जाए जीवन
दिल से फिर भी छूट न पाए, कैसा है बंधन

एक हकीकत है जिंदगी, अपने दम पर कुछ करना है
पर वो बोले ये जिंदगी, बस प्यारा सा इक सपना है
कैसे समझायें, ज़िम्मेदारी में, कहीं खो गयी है धड़कन
करनी पड़ती है मेहनत, सपनों से चलता नही जीवन 

Wednesday, 3 May 2017

अजनबी रिश्ते


रिश्ते सारे अपने हैं, पर कहीं कुछ है अजनबी
हँसी बहुत है, लेकिन कहीं, नमी सी है छिपी छिपी

दिन भर हँसते गाते बीते, कोई फ़िक़र कोई बात नहीं
पर जाने क्यूँ रात भर, जगती हैं आँखें कभी कभी.....

"खुशियाँ हैं तो गम भी हैं", हर कोई ये कहता है
गम क्यूँ इतने भारी होते, बोझ लगे हैं जिंदगी.....

कुछ यादें आती बरसों की, कुछ कल की तो कुछ परसों की
मिटा देता है बस इक लम्हा, गुज़रा था जो अभी अभी....

अक्सर क्यूँ ये रिश्ते अपने,,,,
बिखर जाते हैं बन के सपने,,,,,
गुज़रते जाते वक़्त की है ये, जाने कैसी दिल्लगी....

रिश्ते सारे अपने हैं...... पर
कहीं कुछ है अजनबी,......

-विभा

Saturday, 22 April 2017

बड़े काम का हैश टैग



हैश टैग की भाषा ..........
आजकल फसबुक पर हर दूसरी तस्वीर कैप्शन के साथ पोस्ट की जाती है  और उस कैप्शन में होते हैं ढेर सारे हैश टैग्स ....ज़्यादातर हैश टैग्स अपने शब्दों को बोल्ड दिखने के लिए ऐड किये जाते हैं
एक एक कैप्शन में ४-५ हैश टैग्स.....

क्या आपको पता है कि इन हैश टैग की क्या उपयोगिता है
और हम...... इसके साथ क्या कर रहे हैं ....

कुछ दिनों पहले मैंने फेसबुक पर ही एक प्रोफेसर का लेख पढ़ा था, जिसमे उन्होंने अपने स्टूडेंट्स को कोई प्रोजेक्ट दिया था और उन सबको अपने-अपने प्रोजेक्ट्स फेसबुक पर ही एक particular हैश टैग के साथ पोस्ट करने को कहा था, उसका फायदा ये हुआ कि अब कोई भी उस particular हैश टैग पर क्लिक करके सारे प्रोजेक्ट्स देख सकता है और उसका लाभ उठा सकता है.

आप फेसबुक इस्तेमाल करते वक़्त किसी भी हैश टैग पर क्लिक किजिये और देखिये  कि क्या क्या मटेरियल दिखाई देता है, अब आप अपने ही किसी हैश टैग वाले कैप्शन पर क्लिक करके देखिये.....
आप अपनी किसी पब्लिक पोस्ट पर जो भी हैश टैग देते हैं वो सर्च में दिखाई देता है

आप हैश टैग के माध्यम से अपना खुद का ब्रांड बना सकते हैं या अपनी कोई शायरी, creativity, या और कोई स्किल को searchable बना सकते हैं , बस जरूरत है तो हैश टैग के सही इस्तेमाल की .......
ऐसा न हो कि आपके किसी हैश टैग कैप्शन पर कोई क्लिक करे तो उसे सिर्फ बेकार की चीज़ें दिखाई दें

तो अब से अपनी किसी भी पब्लिक पोस्ट पर ध्यान देकर हैश टैग करें और सार्थक शब्दों को ही हैश टैग बनाएं
धन्यवाद 

Tuesday, 11 April 2017

I 'Unlike' You




अनलाइक ,,,,,
कभी सोचा है कि फेसबुक पर ये बटन क्यों नहीं है
कुछ समय पहले फेसबुक पर लाइक के साथ साथ और भी Expressions जोड़े गये थे, जैसे नाराजगी का, ख़ुशी का, प्यार का..... लेकिन unlike का क्यों नहीं......

फेसबुक पर हम सब बहुत सारे दोस्त बनाते हैं, पर ये दोस्त कभी भी हमारे उन दोस्तों जैसे नहीं बन सकते जो हमारे मुंह पर ही कह सकें कि हमारी बात उन्हें अच्छी नहीं लगी, या हमारी फोटो बहुत ही खराब आई है
आज के दौर में फेसबुक पर "nice pic" ने कहर सा मचा रखा है,
बात मज़ाक की जरूर है लेकिन सच भी है
आज के टाइम में कई बड़े बुजुर्ग भी फेसबुक पर सक्रिय हैं, हो सकता है कि उन्हें बच्चों के फोटो न अच्छे लगते हो या उनकी बाते बच्चो को अच्छी न लगती हो, पर लाइक तो करना ही है न , कमेंट में nice pic , nice written भी लिखना ही है
nice pic, nice written ..... एक फॉर्मल सी तारीफ,,,,,,,
लेकिन हम खुश हो जाते हैं
पर इसने कही कोई अपनापन महसूस नहीं होता, कही कोई चुहलबाजी नहीं....
ये सही है कि लोग बहुत सारी फोटो में से छांटकर सबसे अच्छी pic अपलोड करते हैं, सबसे अच्छा स्टेटस डालते हैं, और किसी को उन्हें हतोत्साहित नहीं करना चाहिए
पर शायद हम सुनना भी नहीं चाहते अपने बारे में कोई बुरी बात.....
कोई अगर लगातार हमारे बारे में बुरा बोलेगा तो शायद हम उसे ब्लॉक ही कर देंगे,

शायद इसलिए ही ज़ुकरू भैया ने unlike का बटन नही दिया, क्योंकि फेसबुक की दुनिया नये नये दोस्त बनाने से ही बढती है और अगर unlike वाले आप्शन कि वजह से सब एक दूसरे को ब्लॉक करते रहे तो फेसबुक बंद ही हो जाएगा न,,,,,,

नोट- इस लेख का मतलब ये नहीं है कि मेरी फोटू या स्टेटस पर "nice pic, nice written" न लिखा जाए, अरे भई मुझे भी तारीफ़ चाहिए और फेसबुक कि दुनिया में बने रहना भी तो है,,,
"Nice Pic" अमर रहे

Saturday, 1 April 2017

amazon ad.


अभी कल ही मेरी एक सहेली ने whatsapp पर मुझे ये तस्वीर भेजी थी जिसमें दिखाया गया है कि amazon पर गोबर के कंडे भी sale हो रहे हैं . उसके बाद मैंने और भी कुछ चीज़ें सर्च करके देखीं , जैसे- बेल पत्र, तुलसी इत्यादि . देखकर हैरानी हुयी और साथ ही साथ ख़ुशी भी कि ये सभी चीज़ें ऑनलाइन उपलब्ध हैं.

अब सुनो मेरी छोटी सी अक्ल की बड़ी सी दौड़..........
अगर ये चीज़ें ऑनलाइन sale हो रही हैं तो इसमें मजाक बनाने जैसी कोई बात नही है
बल्कि हमे तो खुश होना चाहिए,
बाज़ार वही बेचता है जो लोग खरीदना चाहते हैं
और लोगो में ये चीज़ें खरीदने कि जागरूकता होना एक बहुत अच्छा संकेत है
आजकल बड़े बड़े शहरों में न तो कोई गाय या भैंस पालता है और न ही कोई बेल का पेड़ लगाता है
हाँ तुलसी जी शायद कई लोग अपने घरो में लगाते हैं
लेकिन इन्ही बड़े बड़े शहरों में, जिनके बारे में हम सोचते हैं कि जहाँ हमारी संस्कृति और रीति रिवाज़ ख़त्म से हो चुके हैं , वहां इन सभी चीज़ों कि डिमांड बने रहना तो ख़ुशी की  बात है

 आज जबकि हमारा देश फिर से विश्व गुरु बनने कि ओर अग्रसर है वहाँ ऐसी न्यूज़ मन को बहुत सुकून देती है
-विभा

Friday, 10 March 2017

कुछ रंग नए बनाएं





आज चलो फिर होली खेलें,पर कुछ रंग नए बनाएं
रंग बिरंगे रंगों में, कुछ मिजाज़ का तडका लगायें

इक रंग घोलें शरारत का, मन भर सबको सताएं
भागें- दौडें, उछलें-कूदें, मस्ती में खिलखिलाएं

शोखियों में डूब जाएँ फिर, खुद पे थोडा इतरायें
रूठा-रूठी छोड़ के थोडा, सबके नाज़ उठाएं

थोडा सा रंग मुहब्बत का, भर मुट्ठी में छिपा लायें
चुपके से रंग के खुद को ही, उन यादो में भीग जाएँ

आज चलो फिर होली खेलें............

Monday, 6 March 2017

आखिर तुम एक औरत हो


खोया खोया सा कुछ मन है, और आँखों में नीर है
आँसू में बचपन की इक धुंधली सी तस्वीर है

खुला खुला वो घर का आँगन, खिली खिली वो धूप थी
कभी बरखा की नन्ही बूँदें, अठखेली क्या खूब थी
संभाल के दिल में रक्खे हैं, वो पल इक जागीर है
आँसू में बचपन की इक धुंधली सी तस्वीर है

बाबा-दादी, पापा-मम्मी, चाचा-चाची, दीदी-भैया
सारे रिश्ते नाते मिलकर, ख़ुशी से नाचें ता-ता थैया
अपनों से मिली थी जो, वो हँसी तो बेनज़ीर है
आँसू में बचपन की इक धुंधली सी तस्वीर है

खो गयी सारीअल्हड़ता, जाने कब गुज़र गया बचपन
"आखिर तुम एक औरत हो"... इन शब्दों में सिमट गया जीवन
"ज़िम्मेदारी समझो"........, बस यही मेरी तकदीर है
कोई ना समझा मेरे दिल को ,बस इतनी सी पीर है 

Friday, 3 March 2017

नई प्रार्थना.. !!!

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, मा कश्चिद् दुखभागभवेत "

सभी सुखी हों, कोई भी दुःख का भागी ना हो,
जाने कब से हम सभी ये प्रार्थना गाते आ रहे हैं,
पर क्या कभी सोचा है,,, कि हम सुख और दुःख में कैसा व्यवहार करते हैं

दुःख में भगवान् के आगे माथा टेकते हैं, रोते हैं...
और सुख में उसी भगवान् पर प्रसाद और पैसे फेंक कर चढाते हैं
सोचकर देखिये,,,,
क्या कभी सामान्य दिनों में ऐसा हुआ है कि मंदिर जाने पर हमारी आँखें भर आई हों कि उसने हमे कितना कुछ दिया है, और हमने भगवान् को उसकी नेमतों और रहमतो के लिए दिल से धन्यवाद दिया हो....

ऐसे ही जब हम सुखी होते है तो आपस में लड़ते हैं....
मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारे के लिए,,,,,
और जब दुखी होते हैं तो उस परम शक्ति कि "हर चौखट" पर माथा टेकने को तैयार हो जाते है,
चाहे वो मंदिर हो, चाहे मस्जिद, चाहे गुरुद्वारा....
तब हमारी नज़र में किसी भी धार्मिक स्थल में कोई फर्क नही होता, सबमे भगवान् दिखाई देते हैं

सुख में गरीबो और असहायो को हेय दृष्टि से देखते है, दुत्कार देते हैं...
दुःख में हर तरह का दान करते हैं, कि ना जाने कब किसकी दुआएं काम आ जाएँ....
सुख में दूसरे की मदद भी एहसान जताकर करते हैं, बिना ये सोचे कि उस प्रभु ने हमे किसी कि मदद के लायक बनाया है, खुद पर अहंकार करने लगते हैं ,जबकि दुःख में किसी का भी कोई भी काम करने को तैयार हो जाते हैं,,,

ये सब देखकर मन में विचार आता है कि इंसान सुख में ज्यादा अच्छा है या दुःख में....!!!!
क्या ये संसार दुखी होकर ज्यादा सुखी रह सकता है !!!!
भविष्य में धर्म के नाम पर झगडे बंद हो सकें, परोपकार की भावना बढ़ सके, सबको एक परम शक्ति पर विश्वास हो......
क्या इसके लिए हमें अपनी प्रार्थनाएं अब बदल देनी चाहिए..... :( :'(
"सर्वे भवन्तु दुखिनः"...................

Thursday, 2 March 2017

छोटी सी गुडिया

सावन में झूले पड़ते थे , झूले झूला करती थी
बारिश की रिमझिम में गीतों पर
छम छम झूमा करती थी

पहन कर लम्बी सी साडी , सजाकर छोटी सी बिंदिया
आँखों में काजल भर कर के
खुद पर ही मैं मरती थी

पराये घर जाना है इक दिन, अक्सर ये कहते थे लोग
सुन-सुन कर खुश होती थी
कभी मन ही मन डरती थी

इक छोटी गुडिया शादी करके, क्यूँ इतनी बड़ी हो जाती है
कैसे सह लेती है सब कुछ
सबसे पूछा करती थी

मैं भी तो अब नहीं हूँ छोटी , बहुत बड़ी हो गयी हूँ शायद
आज बैठकर सोचा तो,,,,,,,,
आँखें झर-झर झरती थी......

-विभा 

Monday, 27 February 2017

हम भी ज्ञानी

दुनिया में कितने लोग भूख प्यास से मर जाते हैं ,
हमारा फ़र्ज़ है कि हम ऐसे लोगों को ध्यान में रखते हुए त्याग करें ......
होली पर पानी कि बर्बादी ना करें
दीपावली पर पटाखे ना चलायें

कोई भी त्यौहार आते ही पूरा का पूरा सोशल मीडिया ऐसे ज्ञान से भर जाता है
मने हर कोई त्यागी और ज्ञानी हो जाता है

अब सुनो मेरी #छोटी_सी_अकल_की_बड़ी-सी_दौड़ .....
आप सभी के घर में कोई ना कोई छोटा बच्चा तो जरूर ही होगा
बहुत शैतानी करता होगा, खाना नही खाता होगा
आपकी बिलकुल भी नही सुनता होगा
तो जब एक छोटा सा बच्चा जो कि आप पर ही निर्भर है, आप उसको नही सिखा सकते तो और किसी को कैसे सिखा सकते हैं
मैं किसी की Parenting पर ऊँगली नही उठा रही , ना ही किसी को Hurt करना चाहती हूँ
बस एक बात जो मैं सोचती हूँ, वही सबसे शेयर करना चाहती हूँ

कोई भी इंसान अपना त्यौहार कैसे मनाता है, ये उसका अपना निर्णय है
हम किसी को रोक नही सकते
हम जो भी कर सकते हैं वो सिर्फ ये है कि खुद में सुधार .....
हमारी वजह से किसी को कोई परेशानी ना हो
अगर किसी को रंगों से अलर्जी है या कोई रंगों से नही खेलना चाहता तो उस पर रंग ना डालें
या दीपावली पर रास्ते में पटाखे ना रखें
बस इतना ही......

बाकी जैसे अपना मन हो वैसे त्यौहार मनाओ और जैसा दूसरा मनाना चाहे उसे मनाने दो
दो लाइन्स याद आ रही हैं, सोच रही हूँ कि लिख ही दूं-
"बदलना सारे ज़माने को इक ख्वाब सा है,
अगर तुम खुद को बदल लो तो इन्कलाब सा है"

इसी बात पर ..... होली है ......
रंग बिरंगी होली के मौसम की शुभकामनाएं
वैसे मैं बता दूं कि मुझे गुजिया खाने से कोई परहेज़ नही है, जो भी चाहे वो मेरे लिए ला सकता है
बस भांग वाली नही होनी चाहिए :D :D

Sunday, 26 February 2017

जागो रे

जागो रे ......
अलार्म अभी बजा नहीं , किसान अभी मरा नही, खिलाड़ी अभी हारा नही, रेप अभी हुआ नही
किसान को मरने दो, खिलाड़ी को हारने दो, रेप अभी होने तो दो , अलार्म अभी बजने तो दो
फिर,,,,, भाषण करेंगे , भूख हड़ताल करेंगे, फेसबुक पे क्रांति करेंगे
पर फिलहाल...... अलार्म अभी बजा नहीं ....

एकदम आज कि स्तिथि को दर्शाता हुआ विज्ञापन ....
एक आग सी है इसकी पंक्तियों में , कुछ कर गुजरने का जुनून
एक सन्देश भी है...
भले ही ये एक चाय का विज्ञापन है लेकिन थोड़ी देर के लिए सबके दिल और दिमाग को भेदता सा है
लेकिन.... थोड़ी ही देर बाद..................
थोड़ी देर में दूसरा विज्ञापन शुरू , सब चाय पीने लग जाते हैं और
ये अलार्म फिर से बंद हो जाता है सबके दिमाग में

अब सुनो,,,,,,,,, मेरी  #छोटी_सी_अकल_की_बड़ी_सी_दौड़
जहाँ तक मैं सोचती हूँ हम इसके लिए किसी पर दोष नही लगा सकते
इंसानी फितरत है ये -
भूख लगती है तो खाना खाता है
प्यास लगती है तो पानी पीता है
या कोई इंसान चुपचाप उसकी जिंदगी से चला जाए तब उसकी अहमियत को महसूस करता है
ठीक उसी तरह जब कोई घटना होती है तो क्रोधित होता है फिर भूल जाता है और अपने काम पर लग जाता है
यहाँ तक कि उस बुरी घटना से सम्बंधित लोग भी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने लगते हैं
हालाँकि उनके दिल में यादें और टीस बाकी रह जाती है ,
लेकिन जिंदगी आगे बढ़ने का नाम है

इसलिए....
क्रांति करें या ना करें लेकिन इन घटनाओं से सबक जरूर लेना चाहिए
हम किसी और को नही सिखा सकते
किसी को रोक नहीं सकते
लेकिन खुद में तो सुधार ला सकते हैं ना
अपने आस पास के लोगों और अपने बच्चों को अच्छा बनने कि सीख दे सकते हैं ,
जिससे कम से कम आगे ऐसी घटनाओं में कमी आये और एक अच्छे भविष्य कि नींव रखी जा सके

तो .......
जागो रे,,, चाय पियो और मुझे भी पिलाओ रे :)