डबडबाई सी आँखें, जरा कंपकंपाये से हाथ
और चेहरा छुपा के कहती हूँ - "हाँ.... ठीक हूँ मैं"
सभी करते हैं ऐसे,,,,,,,
फिर कौन सी unique हूँ मैं
सबके साथ खिल-खिल करना,
अकेले चुपचाप उसकी यादों में मरना
जो न कभी किसी को सुनाई दे,,,,,
वो गहरे मन कि चीख हूँ मैं.....
सभी जीते हैं ऐसे,,,,,,,
फिर कौन सी unique हूँ मैं
चलते-चलते रुक जाऊं, यूं ही बैठे-बैठे सो जाऊं
जहाँ का कोई पता न हो, किसी ऐसी दुनिया में खो जाऊं
देखूं तो कौन याद करेगा, किसके मन की मीत हूँ मैं....
सभी चाहते हैं ऐसे,,,,,,,
फिर कौन सी unique हूँ मैं ...........
हजारों मौतें मरती हूँ, लाखों आँसू पीती हूँ
जीवन से मुझे बैर बहुत है,,,,, फिर भी इसको जीती हूँ
खुद से ही तो जंग है मेरी,,,,
और खुद पर ही इक जीत हूँ मैं....
भले किसी के लिए न हूँ,,,,,, पर खुद के लिए unique हूँ मैं....
-विभा

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