कुछ ख्याल,,,,
इतने उलझ से गये हैं
सुलझाने की कोशिश कर रही हूँ कितनी देर से,,,,
नाकाम कोशिश....
किस बात को सोचने से शुरू किया था
सोचते सोचते कहाँ आ गयी हूँ
सिरा ही नही मिल रहा
सिर इतना भारी हो चला है
झटक देना चाहती हूँ सब कुछ
लेकिन कैसे....
कुछ बातें,,,,
दिमाग को पता है कि होनी ही हैं
लेकिन दिल नही चाहता कि ऐसा कुछ हो
दिमाग भी थक गया है दिल को समझाते समझाते
कोई उम्र भर साथ नही रहता
अकेलापन सत्य है,,,,,
एक एक करके साथ छूटता सा जा रहा है सबका
लेकिन रुको, मैं यही तो चाहती थी न
अकेलापन,,,,
मुझे तो खुश होना चाहिए
हाँ मैं खुश हूँ
जो चाहो वो मिल जाये तो खुशी होती है
हाँ मानती हूँ कि दिल बहुत दुखता है, जब किसी का साथ छूटता है, लेकिन वक़्त के साथ आदत हो जाती है उसके बिना रहने की
आदत हो चली है अब,,,,
मोह छूटता जा रहा है सबसे
सब कुछ धुंधला होता जा रहा है
इस अकेलेपन को, इस सन्नाटे को रूह के अंदर तक समा जाने दो....
इतना कि मैं खुद की चीख तक न सुन पाऊँ
इन ख्यालों की उलझन से निकलकर बस यही सोचूँ,,,,,
हाँ मैं खुश हूँ
बहुत खुश....
-विभा

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