कोई कविता लिखूँ
लेकिन किस पर लिखूँ...........
बारिश हो रही है,
हाँ चलो मैं कविता लिखती हूँ,,,,,
बरसते हुए पानी पर,
इस मौसम रूमानी पर
ठंडी मस्त हवाओं पर,
और बूँदों की अदाओं पर
हरियाली नई नवेली पर,
नदियों की अठखेली पर....
खिलखिलाते भीगते मासूमों पर,
ख़ुशी में टकराते जामों पर
हाँ चलो, मैं कविता लिखती हूँ,,,,
लेकिन ये क्या,,,,बारिश तो रुक गयी
निकल आयी है धूप, चमचमाती हुई शीशे जैसी
आंखों में चुभती हुई,,,
अब कविता किसपे लिखूँ .....
दिन भर के थके कंधो पर
या छाँव ढूंढते परिंदों पर
गर्मी में तपते मकानों पर
या पसीना पोंछते इंसानों पर
सडको पे गाडियों की कतारों पर,
या शोर मचाते बाजारों पर
कीचड़ भरी गलियों पर
या अधखिली मरती कलियों पर
सूखे पपडाते होठों पर
या नम होती आंखों पर.............
बाहर के मौसम के साथ बदलता है दिल का मौसम भी....
कभी उदास होता है, तो किसी मौसम में ढूंढ लेता ख़ुशी
"हर पल बदलता मौसम, यही तो भगवान की #कुदरत है
कहीं ढूंढे गम कहीं ढूंढे ख़ुशी, यही इंसान की #फितरत है...."

1 comment:
Bahut sundar Ji 👌👌
Post a Comment