ये बरसात का मौसम,,,,,
अचानक कहीं से आ गया है
एक गहरा काला सा बादल
यादों से लबालब भरा हुआ
बारिश की आशंका से भागती हुई मैं
उतार लाती हूँ सुबह से सूखते नींद के कपड़े
अलमारी में रख देती हूँ सपनों के बड़ी-पापड़
लगा देती हूँ सांकल आंखों की रसोई की
कि भीग सकूँ कुछ देर....
अपनी मनपसंद बारिश में
तेज हो रही बूंदें
लगातार बरस रही यादें
भीगने दो आज जी भर के
आखिर कभी कभी तो छाता है ये बादल
क्यूँ न भीगूँ,,,,
जी चाहता है समेट लूँ इसकी एक एक बूंद को
इनमे भरे अल्फाज़ो की ठंडक को
इनके एहसासों की सोंधी खुशबू को
और रच डालूँ एक प्यारी सी कविता
लेकिन शब्द हैं कि हाथों में रुकते ही नहीं
कविता के हाथ खोलती हूँ
एहसासों की बूंदे समेटने की कोशिश करती हूँ
लेकिन फिसल जाते हैं हाथ से शब्द
एक के बाद एक, कोई नही टिकता
थक गई हूं कोशिश करते करते
फिर छोड़ देती हूँ, बह जाने देती हूँ सब
बस आनंद लेती हूँ इन यादों में भीगने का,,,,,
अंदर तक नम कर गयी है ये बारिश
अब इस नम मिट्टी में ही तो उगेंगे
छोटे छोटे कविताओं के फूल
फिर सहेज कर रखूंगी उन्हें
अगली बारिश के इंतज़ार में
ताकि ये लहलहा सकें, मेरी डायरी की बगिया में
जो गर धूप भी निकल आये ज़िम्मेदारियों की
तो भी इनकी हरियाली यूं ही बनी रहे
-विभा

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