Saturday, 29 July 2017

नींद भी इक ख्वाब है.....


करवटें, सलवटें, दर्द बेहिसाब है
मासूम सी सुकून की, नींद भी इक ख्वाब है

नुकीली सी पथरीली सी ये यादों की गलियां
छुइमुई सपनीली सी, नैनों की कलियां
छिलता है इश्क़ मेरा, न कोई हिज़ाब है
मासूम सी, सुकून की, नींद भी इक ख्वाब है

दौड़ती, भागती, मुसाफिर सी धड़कनें
रुके ख्याल ताकते, बुझे-बुझे अनमने
ठहरेंगे कभी पल दो पल, न कोई जबाब है
मासूम सी सुकून की, नींद भी इक खबाब है

उठी-गिरी, मचलती ये लहरों की हिचकियाँ
दबी-दबी, घुटी-घुटी, किनारों सी सिसकियां
बांध तोड़ ये अश्क़ आज, बहने को बेताब हैं
मासूम सी सुकून की, नींद भी इक ख्वाब है
-विभा

Wednesday, 19 July 2017

मेरी तीज



किसी का मन हिलोरे मारता है
क्योंकि किसी के प्यार का सागर है,,उसके जीवन में
किसी के मन में तरंगे उठती हैं
क्योंकि उसकी ज़िंदगी को खुशियों की vibrations छू के जाती हैं
किसी का मन झंकृत होता है
क्योंकि कहीं कोई उसके लिए प्रेम का संगीत छेड़े हुए है
 किसी का मन मयूर सावन में नाच उठता है
क्योंकि कहीं किसी की आँखें बरस रही हैं
 सिर्फ उससे मिलने के लिए....

लेकिन मेरा मन,,,,,,
मेरा मन तो जैसे रेगिस्तान हो रखा है
दूर तक बस रेत ही रेत
न हिलोरें, न तरंगें
न झंकार, न नर्तन
बस एक न बुझने वाली प्यास है

सुनो.....
पहले ऐसा नहीं था
मेरे मन भी था, लबालब भरा हुआ
प्रेम से,,,,,
इठलाता फिरता, कुलांचे भरता
ढूंढता हुआ किसी को,,,,,,,
जिसे तलब हो इस अमृत की
जो आये तो दो बूंद चखने को
और मैं लौट दूँ पूरा का पूरा सागर उस पर
जिसे मेरी चाहत हो, सिर्फ मेरी.....

"हम भटकते हैं, क्यूँ भटकते हैं,
दश्त-ओ-सेहरा में
ऐसा लगता है, मौज प्यासी है,
अपने दरिया में"

बस ढूंढती ही रह गयी मैं तो
और ये दरिया कब सूख गया,
पता ही नहीं चला
अब कोशिश करना चाहूँ तो भी
इन पथराई आंखों में नमी तक नहीं आती
कांटे से उग आए हैं गले में
प्रेम की चंद बूंदों की खोज में भटकती फिरती हूँ
अरे,,,,, वो क्या सामने
शायद प्रेम है
तेजी से भागकर जाती हूँ,
फिर गिर पड़ती हूँ
कोई नहीं है, कुछ नहीं है मेरे लिए
सिर्फ मेरा भ्रम,,,,,
और इस भरम के साथ जीती हुई मैं.....
-विभा 

Saturday, 15 July 2017

यादों की बारिश


ये बरसात का मौसम,,,,,
अचानक कहीं से आ गया है
एक गहरा काला सा बादल
यादों से लबालब भरा हुआ

बारिश की आशंका से भागती हुई मैं
उतार लाती हूँ सुबह से सूखते नींद के कपड़े
अलमारी में रख देती हूँ सपनों के बड़ी-पापड़
लगा देती हूँ सांकल आंखों की रसोई की
कि भीग सकूँ कुछ देर....
अपनी मनपसंद बारिश में

तेज हो रही बूंदें
लगातार बरस रही यादें
भीगने दो आज जी भर के
आखिर कभी कभी तो छाता है ये बादल
क्यूँ न भीगूँ,,,,

जी चाहता है समेट लूँ इसकी एक एक बूंद को
इनमे भरे अल्फाज़ो की ठंडक को
इनके एहसासों की सोंधी खुशबू को
और रच डालूँ एक प्यारी सी कविता

लेकिन शब्द हैं कि हाथों में रुकते ही नहीं

कविता के हाथ खोलती हूँ
एहसासों की बूंदे समेटने की कोशिश करती हूँ
लेकिन फिसल जाते हैं हाथ से शब्द
एक के बाद एक, कोई नही टिकता
थक गई हूं कोशिश करते करते

फिर छोड़ देती हूँ, बह जाने देती हूँ सब
बस आनंद लेती हूँ इन यादों में भीगने का,,,,,

अंदर तक नम कर गयी है ये बारिश
अब इस नम मिट्टी में ही तो उगेंगे
छोटे छोटे कविताओं के फूल
फिर सहेज कर रखूंगी उन्हें
अगली बारिश के इंतज़ार में
ताकि ये लहलहा सकें, मेरी डायरी की बगिया में

जो गर धूप भी निकल आये ज़िम्मेदारियों की
तो भी इनकी हरियाली यूं ही बनी रहे
-विभा


Sunday, 9 July 2017

कविता किसपे लिखूँ .....


कोई कविता लिखूँ
लेकिन किस पर लिखूँ...........

बारिश हो रही है,
हाँ चलो मैं कविता लिखती हूँ,,,,,
बरसते हुए पानी पर,
इस मौसम रूमानी पर
ठंडी मस्त हवाओं पर,
और बूँदों की अदाओं पर
हरियाली नई नवेली पर,
नदियों की अठखेली पर....
खिलखिलाते भीगते मासूमों पर,
ख़ुशी में टकराते जामों पर
हाँ चलो, मैं कविता लिखती हूँ,,,,

लेकिन ये क्या,,,,बारिश तो रुक गयी
निकल आयी है धूप, चमचमाती हुई शीशे जैसी
आंखों में चुभती हुई,,,
अब कविता किसपे लिखूँ .....

दिन भर के थके कंधो पर
या छाँव ढूंढते परिंदों पर
गर्मी में तपते मकानों पर
या पसीना पोंछते इंसानों पर
सडको पे गाडियों की कतारों पर,
या शोर मचाते बाजारों पर
कीचड़ भरी गलियों पर
या अधखिली मरती कलियों पर
सूखे पपडाते होठों पर
या नम होती आंखों पर.............

बाहर के मौसम के साथ बदलता है दिल का मौसम भी....
कभी उदास होता है, तो किसी मौसम में ढूंढ लेता ख़ुशी
"हर पल बदलता मौसम, यही तो भगवान की #कुदरत है
कहीं ढूंढे गम कहीं ढूंढे ख़ुशी, यही इंसान की #फितरत है...."