Sunday, 25 June 2017

हाँ,,,, मैं खुश हूँ


कुछ ख्याल,,,,
इतने उलझ से गये हैं

सुलझाने की कोशिश कर रही हूँ कितनी देर से,,,,
नाकाम कोशिश....

किस बात को सोचने से शुरू किया था
सोचते सोचते कहाँ आ गयी हूँ
सिरा ही नही मिल रहा
सिर इतना भारी हो चला है
झटक देना चाहती हूँ सब कुछ

लेकिन कैसे....

कुछ बातें,,,,
दिमाग को पता है कि होनी ही हैं
लेकिन दिल नही चाहता कि ऐसा कुछ हो
दिमाग भी थक गया है दिल को समझाते समझाते
कोई उम्र भर साथ नही रहता
अकेलापन सत्य है,,,,,

एक एक करके साथ छूटता सा जा रहा है सबका
लेकिन रुको, मैं यही तो चाहती थी न
अकेलापन,,,,
मुझे तो खुश होना चाहिए
हाँ मैं खुश हूँ
जो चाहो वो मिल जाये तो खुशी होती है
हाँ मानती हूँ कि दिल बहुत दुखता है, जब किसी का साथ छूटता है, लेकिन वक़्त के साथ आदत हो जाती है उसके बिना रहने की

आदत हो चली है अब,,,,
मोह छूटता जा रहा है सबसे
सब कुछ धुंधला होता जा रहा है
इस अकेलेपन को, इस सन्नाटे को रूह के अंदर तक समा जाने दो....
इतना कि मैं खुद की चीख तक न सुन पाऊँ
इन ख्यालों की उलझन से निकलकर बस यही सोचूँ,,,,,
हाँ मैं खुश हूँ
बहुत खुश....
-विभा

Tuesday, 6 June 2017

हाँ....unique हूँ मैं....


डबडबाई सी आँखें, जरा कंपकंपाये से हाथ
और चेहरा छुपा के कहती हूँ - "हाँ.... ठीक हूँ मैं"
सभी करते हैं ऐसे,,,,,,,
फिर कौन सी unique हूँ मैं 

सबके साथ खिल-खिल करना,
अकेले चुपचाप उसकी यादों में मरना
जो न कभी किसी को सुनाई दे,,,,,
वो गहरे मन कि चीख हूँ मैं.....
सभी जीते हैं ऐसे,,,,,,,
फिर कौन सी unique हूँ मैं 

चलते-चलते रुक जाऊं, यूं ही बैठे-बैठे सो जाऊं
जहाँ का कोई पता न हो, किसी ऐसी दुनिया में खो जाऊं
देखूं तो कौन याद करेगा, किसके मन की मीत हूँ मैं....
सभी चाहते हैं ऐसे,,,,,,,
फिर कौन सी unique हूँ मैं ...........

हजारों मौतें मरती हूँ, लाखों आँसू पीती हूँ
जीवन से मुझे बैर बहुत है,,,,, फिर भी इसको जीती हूँ
खुद से ही तो जंग है मेरी,,,,
और खुद पर ही इक जीत हूँ मैं....
भले किसी के लिए न हूँ,,,,,, पर खुद के लिए unique हूँ मैं....

-विभा