किसी का मन हिलोरे मारता है
क्योंकि किसी के प्यार का सागर है,,उसके जीवन में
किसी के मन में तरंगे उठती हैं
क्योंकि उसकी ज़िंदगी को खुशियों की vibrations छू के जाती हैं
किसी का मन झंकृत होता है
क्योंकि कहीं कोई उसके लिए प्रेम का संगीत छेड़े हुए है
किसी का मन मयूर सावन में नाच उठता है
क्योंकि कहीं किसी की आँखें बरस रही हैं
सिर्फ उससे मिलने के लिए....
लेकिन मेरा मन,,,,,,
मेरा मन तो जैसे रेगिस्तान हो रखा है
दूर तक बस रेत ही रेत
न हिलोरें, न तरंगें
न झंकार, न नर्तन
बस एक न बुझने वाली प्यास है
सुनो.....
पहले ऐसा नहीं था
मेरे मन भी था, लबालब भरा हुआ
प्रेम से,,,,,
इठलाता फिरता, कुलांचे भरता
ढूंढता हुआ किसी को,,,,,,,
जिसे तलब हो इस अमृत की
जो आये तो दो बूंद चखने को
और मैं लौट दूँ पूरा का पूरा सागर उस पर
जिसे मेरी चाहत हो, सिर्फ मेरी.....
"हम भटकते हैं, क्यूँ भटकते हैं,
दश्त-ओ-सेहरा में
ऐसा लगता है, मौज प्यासी है,
अपने दरिया में"
बस ढूंढती ही रह गयी मैं तो
और ये दरिया कब सूख गया,
पता ही नहीं चला
अब कोशिश करना चाहूँ तो भी
इन पथराई आंखों में नमी तक नहीं आती
कांटे से उग आए हैं गले में
प्रेम की चंद बूंदों की खोज में भटकती फिरती हूँ
अरे,,,,, वो क्या सामने
शायद प्रेम है
तेजी से भागकर जाती हूँ,
फिर गिर पड़ती हूँ
कोई नहीं है, कुछ नहीं है मेरे लिए
सिर्फ मेरा भ्रम,,,,,
और इस भरम के साथ जीती हुई मैं.....
-विभा

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