Monday, 6 March 2017

आखिर तुम एक औरत हो


खोया खोया सा कुछ मन है, और आँखों में नीर है
आँसू में बचपन की इक धुंधली सी तस्वीर है

खुला खुला वो घर का आँगन, खिली खिली वो धूप थी
कभी बरखा की नन्ही बूँदें, अठखेली क्या खूब थी
संभाल के दिल में रक्खे हैं, वो पल इक जागीर है
आँसू में बचपन की इक धुंधली सी तस्वीर है

बाबा-दादी, पापा-मम्मी, चाचा-चाची, दीदी-भैया
सारे रिश्ते नाते मिलकर, ख़ुशी से नाचें ता-ता थैया
अपनों से मिली थी जो, वो हँसी तो बेनज़ीर है
आँसू में बचपन की इक धुंधली सी तस्वीर है

खो गयी सारीअल्हड़ता, जाने कब गुज़र गया बचपन
"आखिर तुम एक औरत हो"... इन शब्दों में सिमट गया जीवन
"ज़िम्मेदारी समझो"........, बस यही मेरी तकदीर है
कोई ना समझा मेरे दिल को ,बस इतनी सी पीर है 

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