Tuesday, 29 August 2017

हम लड़कियाँ,,,,,


हम लड़कियाँ,,,,

अपने हिस्से की खुशियाँ, दूसरों पे वारना
सीख जातीं हैं बचपन से, खुद का मन मारना
एक छोटी सी ज़िद पर भी, खाती हैं झिड़कियाँ
हम लड़कियाँ,,,,

नीचे नज़र से ज़मीन कुरेदतीं, जब कोई झिड़क के जाए
मन ही मन निहाल हो जातीं, जब कोई प्यार बरसाए
कुछ न बोलतीं, चुपचाप देखतीं, नजरों से कनखियाँ
हम लड़कियाँ,,,,

सखी-सहेलियाँ संगी-साथी, घर आंगन चौबारा
याद किसी ने तो किया होगा, आज हमें दोबारा
सोच कर ही मुस्कुरा देतीं, जब-जब आती हिचकियाँ
हम लड़कियाँ,,,,

देहरी से जो कदम निकाला, सोचा के आकाश हो लें
झट से पीछे खींच लिया, लोग पता नहीं क्या-क्या बोलें
पीस लेती हैं खुद को, इज़्ज़त-आज़ादी के दरम्याँ
हम लड़कियाँ

हम बँधे तो क्या हुआ, आने वाली नहीं बंधेंगी
खिलेंगी वो, महकेंगी वो, खुले आसमान में उड़ाने भरेंगी
आने वाली पीढ़ी के लिए, उजाले की खोलती खिड़कियाँ
हम लड़कियाँ,,,,,
-विभा

4 comments:

Unknown said...

Wow... very nice poem... aapne bahut accha likha hai... kya main ise apne FB page par share kar sakti hoon?

विभा said...

जी जरूर कीजिये, its my pleasure :)

कुबेर दत्त शर्मा said...

बेहतरीन...... काफी कुछ लिख दिया कम शब्दों में

विभा said...

धन्यवाद :)