एक डोर में बंधकर भी, अलग-अलग है मन
दिल से फिर भी छूट न पाए, कैसा है बंधन
चाहत थी कि दिल कि बातें, दूजा समझे आँखों से
पर वो बोले, मन की गांठे, खोलो अपनी बातों से
न मैं समझूं, न वो समझे, जुड़े न अपनापन
दिल से फिर भी छूट न पाए, कैसा है बंधन
चाहत थी कि सुख-दुःख में मिले मज़बूत सहारा
छोटी-छोटी बातों से घबराकर, वो ढूंढें हाथ हमारा
वो भी अकेले, हम भी अकेले, गुज़रता जाए जीवन
दिल से फिर भी छूट न पाए, कैसा है बंधन
एक हकीकत है जिंदगी, अपने दम पर कुछ करना है
पर वो बोले ये जिंदगी, बस प्यारा सा इक सपना है
कैसे समझायें, ज़िम्मेदारी में, कहीं खो गयी है धड़कन
करनी पड़ती है मेहनत, सपनों से चलता नही जीवन

No comments:
Post a Comment