एक और दिन गुज़र गया सफर का
हर रात ज़िन्दगी थक कर कुछ देर ठहरती है
दिमाग को निचोड़ कर
उसका रस आँखों से निकालकर पीती है
टुकड़ा-टुकड़ा नींद खाती है
और ख्वाबों के चीथड़ों पर सो जाती है
हाँ, यही है उसकी खुराक़
ये न मिले तो शायद ज़िन्दगी खत्म ही हो जाये
अगले दिन फिर से सफर पर जो निकलना है
ऐसा सफर जो चाहो कि खत्म हो जाये,
लेकिन नहीं होता,,,,,
रास्ते के कंकडों से बचाने वाले अपने ही जूते
अपने पैरों को काटते हैं
उम्मीदों की गठरी भारी होती जाती है
और ज़िम्मेदारी का सूरज अपनी गर्मी बढ़ाता जाता है
मुस्कुराहट के पैर भी थकने लगे हैं
कब तक अपने दम पे उम्र खींचे
दूर-दूर तक कोई प्यार की छाँव नज़र नहीं आती
जहाँ कुछ पल सुस्ता लिया जाए
पहुंचना कहाँ है, ये भी तो नहीं पता
जिस भी पड़ाव तक पहुँचो, वहाँ से दूसरा काम देकर फिर सफर पर भेज दिया जाता है
काश कोई तो ऐसा पड़ाव हो
जहाँ कोई बाहें फैलाये इंतज़ार कर रहा हो
जिसकी गोद में ढेरों नींदें हों
जिसकी आँखों में अपनत्व के झरने हो
ज़िन्दगी जी भर अपनी खुराक़ ले सके
जहाँ से आगे जाने की इच्छा ही न हो
अंतहीन सफर के बाद कहीं तो मिले,,,,,
हर रात ज़िन्दगी थक कर कुछ देर ठहरती है
दिमाग को निचोड़ कर
उसका रस आँखों से निकालकर पीती है
टुकड़ा-टुकड़ा नींद खाती है
और ख्वाबों के चीथड़ों पर सो जाती है
हाँ, यही है उसकी खुराक़
ये न मिले तो शायद ज़िन्दगी खत्म ही हो जाये
अगले दिन फिर से सफर पर जो निकलना है
ऐसा सफर जो चाहो कि खत्म हो जाये,
लेकिन नहीं होता,,,,,
अपने बस में ही नहीं है
रास्ते के कंकडों से बचाने वाले अपने ही जूते
अपने पैरों को काटते हैं
उम्मीदों की गठरी भारी होती जाती है
और ज़िम्मेदारी का सूरज अपनी गर्मी बढ़ाता जाता है
मुस्कुराहट के पैर भी थकने लगे हैं
कब तक अपने दम पे उम्र खींचे
दूर-दूर तक कोई प्यार की छाँव नज़र नहीं आती
जहाँ कुछ पल सुस्ता लिया जाए
पहुंचना कहाँ है, ये भी तो नहीं पता
जिस भी पड़ाव तक पहुँचो, वहाँ से दूसरा काम देकर फिर सफर पर भेज दिया जाता है
काश कोई तो ऐसा पड़ाव हो
जहाँ कोई बाहें फैलाये इंतज़ार कर रहा हो
जिसकी गोद में ढेरों नींदें हों
जिसकी आँखों में अपनत्व के झरने हो
ज़िन्दगी जी भर अपनी खुराक़ ले सके
जहाँ से आगे जाने की इच्छा ही न हो
अंतहीन सफर के बाद कहीं तो मिले,,,,,
अंतहीन सुकून

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